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आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, भारत
प्रस्तुत करता है
“सिनेमा नज़र से नज़र तक” – सिनेमा, समाज और संवेदना का संवाद |

Bhopal

भोपाल। आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, भारत द्वारा एक अभिनव और विचारोत्तेजक सिने आयोजन “सिनेमा नज़र से नज़र तक”का आयोजन 18 जनवरी 2026, शाम 4 बजे से (हाइब्रिड मोड) पर किया गया ।यह आयोजन दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, शिवाजी नगर, भोपाल में संपन्न हुआ । फाउंडेशन की ओर से प्रस्तावना और स्वागत वक्तव्य प्रो आशा शुक्ला द्वारा प्रदत्त किया गया ।

इस विशेष आयोजन के अंतर्गत दो सशक्त और समकालीन विषयों पर आधारित फ़िल्मों — ‘प्यास’ और ‘ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग’ का प्रदर्शन किया गया , जिसके पश्चात सिनेमा, समाज और मानवीय सरोकारों पर केंद्रित संवाद एवं विमर्श आयोजित हुआ ।

फ़िल्म 1 : प्यास।    निर्देशक : सूर्यान्शु सक्सेना

प्यास एक नौजवान अर्जुन की मार्मिक कहानी है, जो परंपरा और सही कर्म के बीच स्वयं को गहरे द्वंद्व में पाता है। पुजारी बनने की राह पर खड़ा अर्जुन अपने अस्तित्व, आस्था और विश्वासों से जूझता है। यह फ़िल्म उसकी उस परिवर्तनकारी यात्रा को दर्शाती है, जो उसके स्थापित विश्वासों को तोड़ते हुए उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाती है।
प्यास आत्म-खोज, आध्यात्मिक अन्वेषण और मानवीय हृदय के अनछुए पहलुओं की एक संवेदनशील और गहन कहानी है, जहाँ आस्था और संदेह आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

फ़िल्म 2 : ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग (Gauva – A Mob Lynching)

निर्देशक : राहुल शर्मा (राहुल्य)
निर्माण : स्वर रंग फ़िल्म्स
निर्माता एवं संगीत : अंतरराष्ट्रीय सितार वादिका सुश्री स्मिता नागदेव

शक्तिशाली और मार्मिक मूक लघु फ़िल्म ‘ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग’ को प्रतिष्ठित खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025 में आधिकारिक स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है। 14 मिनट की यह फ़िल्म 18 जनवरी 2026 को प्रदर्शित की जाएगी।

बिना किसी संवाद के बनी यह फ़िल्म भारत में बढ़ती भीड़ हिंसा (Mob Lynching) की भयावह सच्चाई पर एक गहरी और झकझोर देने वाली टिप्पणी है। कहानी एक ऐसे निराश्रित व्यक्ति की है, जिसकी पत्नी मृत्युशैया पर है और सारा धन उसके इलाज में खर्च हो चुका है। भूखी छोटी बेटी और पत्नी के लिए भोजन जुटाने की मजबूरी में वह सार्वजनिक स्थान से कुछ उठा लेता है, जिसे क्रोधित भीड़ चोरी समझकर उसका पीछा करती है और अंततः उसे पीट-पीटकर मार डालती है।

फ़िल्म की चुप्पी इसकी भावनात्मक तीव्रता को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। राग मियां की तोड़ी पर आधारित बैकग्राउंड म्यूज़िक, जिसमें सितार और तबले का सशक्त प्रयोग किया गया है, फ़िल्म को एक गहरे संवेदनात्मक लोक में ले जाता है। न्यूनतम साधनों के बावजूद, यह फ़िल्म मानव गरिमा, ग़लत सूचना और क़ानून को अपने हाथों में लेने के विनाशकारी परिणामों पर एक सार्वभौमिक संदेश देती है।

फ़िल्म के चयन पर निर्देशक राहुल शर्मा (राहुल्य) ने कहा,

“हमने इस फ़िल्म को भीड़ हिंसा के ख़िलाफ़ एक मूक चीख के रूप में बनाया है। इसके हर शीर्षक के पीछे अकल्पनीय दर्द की एक मानवीय कहानी छिपी है।”

उन्होंने आगे कहा कि ‘ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग’ आत्मनिरीक्षण, सहानुभूति और आवेगी रोष के इस दौर में संवैधानिक न्याय के पालन के लिए एक हार्दिक अपील है।

संवाद एवं विमर्श 

फ़िल्म प्रदर्शन के पश्चात प्रो. राजीव गोहिल (फ़िल्म निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर एवं स्क्रीनप्ले राइटर) के साथ संवाद एवं विमर्श का गहन वैचारिक सत्र आयोजित किया गया । इस सत्र में प्रो. राजीव गोहिल ने भारतीय सिनेमा के इतिहास और सिनेमा की यात्रा में आए सामाजिकता और राजनैतिक पक्षों पर चर्चा की। सिनेमा और कला के महत्व पर ज़ोर देते हुए प्रो. गोहिल ने इस सत्र में कहा कि व्यावसायिक सिनेमा चाहे कितनी प्रगति कर ले, समाज की उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी। इस सत्र में संवादकर्ता के रूप में पत्रकार एवं स्तंभकार (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया) पंकज शुक्ला ने सिनेमा और राजीव गोहिल की इस संदर्भ में विशेषज्ञता को जोड़कर गहरे प्रश्न किए । कार्यक्रम की उपयोगिता से जोड़कर विशद टिप्पणी के साथ डॉ वीणा सिन्हा ने आभार प्रकट किया । कार्यक्रम का सफल संचालन विशाखा राजुरकर और अपर्णा पात्रिकर ने किया । प्रोफ़ आर के शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया और लव चावड़ीकर ने समन्वयन किया । शहर के गणमान्य नागरिक बडी संख्या में उपस्थित रहे।

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