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दतिया कलेक्टर का सख्त अंदाज– “भीड़ से नहीं, नियम से चलेगा प्रशासन, राजनीतिक दबाव में नहीं आऊंगा” |

दतिया

दतिया;- गुलाम’ पटवारी सस्पेंड, तो ‘गैंग’ बनाकर धमकाने पहुँचे साथी; कलेक्टर ने आधे रास्ते से ही खदेड़ा!

दतिया। जिला प्रशासन में उस वक्त खलबली मच गई जब ‘नेताओं की चाकरी’ करने वाले एक भ्रष्ट पटवारी के सस्पेंशन के विरोध में 60 पटवारियों ने शक्ति प्रदर्शन की कोशिश की। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि सामने कोई नेता नहीं, बल्कि नियमों पर चलने वाला एक सख्त आईएएस अधिकारी स्वप्निल वानखेड़े खड़ा है। कलेक्टर ने न केवल उन्हें फटकारा, बल्कि यह भी याद दिलाया कि सरकार उन्हें जनता की सेवा के लिए वेतन देती है, हुड़दंग के लिए नहीं |

क्या था पूरा मामला?
​हाल ही में कलेक्टर वानखेड़े ने बसई क्षेत्र में जनसुनवाई के दौरान पटवारी शैलेंद्र शर्मा को रंगे हाथों झूठ बोलते पकड़ा था। पटवारी ने नेताओं को खुश करने के लिए एक नाली के निर्माण में गलत रिपोर्ट दी थी। कलेक्टर ने ऑन-द-स्पॉट आदेश दिया था: “इसे अभी सस्पेंड करो, मुझे नेताओं के गुलाम नहीं, जनता के सेवक चाहिए।”,

दतिया कलेक्ट्रेट कार्यालय में उस वक्त गहमागहमी बढ़ गई जब बड़ी संख्या में जिले के पटवारी लामबंद होकर जनसुनवाई में दाखिल हुए। पटवारियों की इस भारी भीड़ को देखकर कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े नाराज हो गए और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अनुशासन का पाठ पढ़ाया |

कलेक्टर ने पटवारियों से दो-टूक कहा:
“आप लोग यहाँ 60 की संख्या में भीड़ बनकर क्यों आए हैं? अगर आपको अपनी बात रखनी थी, तो आपके संघ के तीन प्रतिनिधि आकर मुझसे मिल सकते थे। यह जनसुनवाई आम जनता की समस्याओं के लिए है, न कि इस तरह से दबाव बनाने के लिए।”

राजनीतिक दबाव पर बड़ी बात:
कलेक्टर वानखेड़े ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि, “मैं किसी भी तरह के राजनीतिक या सामूहिक दबाव में आने वाला नहीं हूँ। प्रशासन नियमों से चलता है और हर कर्मचारी को अपनी मर्यादा का पालन करना चाहिए।”

अनुशासन का पाठ: कलेक्टर ने पटवारियों को हिदायत दी कि सरकारी कर्मचारी का इस तरह भीड़ में आना ‘कंडक्ट रूल्स’ के खिलाफ है।

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि जनसुनवाई में आए गरीब किसानों और ग्रामीणों का समय कीमती है, और कर्मचारियों को अपने मुख्यालय पर रहकर काम करना चाहिए।

अल्टीमेटम: कलेक्टर ने साफ कर दिया कि यदि भविष्य में इस तरह की अनुशासनहीनता हुई, तो सख्त विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

स्वप्निल वानखेड़े के इस कड़े रुख के बाद कलेक्ट्रेट में सन्नाटा पसर गया और पटवारियों को बैरंग वापस लौटना पड़ा। जिले में इस घटना की चर्चा जोरों पर है कि कैसे एक युवा आईएएस अधिकारी ने ‘दबाव की राजनीति’ को विफल कर दिया।​

यह खबर उन कर्मचारियों के लिए बड़ा सबक है जो सोचते हैं कि ‘यूनियन’ बनाकर वे अपने गलत कामों पर पर्दा डाल सकते हैं। दतिया कलेक्टर ने साबित कर दिया कि जब नियत साफ हो, तो किसी भी ‘भीड़’ से डरने की जरूरत नहीं।

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