स्वच्छ इंदौर’ में मातम, मंत्री जी की जुबान पर ‘घंटा’!
इंदौर
इंदौर… जिसे हम देश का सबसे स्वच्छ शहर कहते हैं, आज वहाँ की आबोहवा में सिसकियाँ और मातम है। भागीरथपुरा में दूषित पानी ने 13 घरों के चिराग बुझा दिए। लेकिन अफ़सोस! जब इन मौतों का हिसाब माँगा गया, तो प्रदेश के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की संवेदना जागने के बजाय उनका पारा हाई हो गया। कैमरे के सामने मंत्री जी ने जो कहा, उसने न केवल पत्रकार को बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा को भी झकझोर कर रख दिया है।”
: भागीरथपुरा का ‘ज़हरीला’ सच
इंदौर का भागीरथपुरा इलाका आज डर के साये में है। नलों से आता ‘ज़हरीला’ पानी अब तक 13 लोगों की जान ले चुका है। अस्पताल बेड से भरे पड़े हैं, लेकिन प्रशासन की नींद अब भी नहीं खुली है।
विवाद का केंद्र: “क्या घंटा हो गया!”
जब मीडिया ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से मौतों और सिस्टम की लापरवाही पर सवाल किया, तो मंत्री जी का जवाब हैरान करने वाला था।
* मंत्री का बयान: “फोकट की बात मत करो… क्या घंटा हो गया!”
* सवाल उठता है: क्या 13 लोगों की जान जाना ‘फोकट’ की बात है? क्या सत्ता के मद में शब्दों की मर्यादा भूल जाना ही ‘सुशासन’ है?
जनता की अदालत: तीखे सवाल
सोशल मीडिया से लेकर गलियों तक, आज इंदौर पूछ रहा है:
* नंबर 1 का टैग या मौत का जाल? अगर शहर स्वच्छ है, तो पानी ज़हरीला कैसे हुआ?
* जवाबदेही किसकी? मौतों का ज़िम्मेदार कौन—नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग या वह मौन तंत्र जिसे सवाल ‘फोकट’ के लगते हैं?
* संवेदना कहाँ है? जिन परिवारों ने अपनों को खोया, क्या उनके आँसुओं की कीमत मंत्री जी की नज़र में ‘घंटा’ बराबर है?
: “कुर्सी पर बैठकर शब्द उछालना आसान है विजयवर्गीय जी, लेकिन उन खाली हो चुके घरों की चौखट पर जाकर देखिये, जहाँ अब सिर्फ सन्नाटा और प्रशासनिक अनदेखी का शोर है।”
इंदौर को अवॉर्ड्स की नहीं, जवाबदेही की ज़रूरत है। अगर मंत्री जी के पास जनता के सवालों के जवाब नहीं हैं, तो उन्हें कम से कम उनके दुखों का मजाक उड़ाने का हक भी नहीं है। यह खबर सिर्फ 13 मौतों की नहीं, बल्कि तंत्र की संवेदनहीनता की अंतिम यात्रा है।
