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अशोकनगर में सामाजिक क्रांति: शिक्षक परिवार ने मृत्यु भोज त्यागकर बौद्ध परंपरा से किया माताजी का अंतिम संस्कार |

अशोकनगर | समाचार विशेष

समाज को नई दिशा: अंधविश्वास और रूढ़िवाद को त्यागकर, बौद्ध वंदना के साथ सुमंत्रा बाई को दी गई अंतिम विदाई*

: शिक्षक एवं समाजसेवी दलूप सिंह और रामकिशन नारायण सिंह (पिपरेसरा) की पूज्य माताजी सुमंत्रा बाई के महापरिनिर्वाण के अवसर पर उनके परिवार ने एक साहसिक और प्रगतिशील निर्णय लिया। उन्होंने तमाम पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं और अंधविश्वासों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए, भारतीय सनातन संस्कृति के गौरवशाली मूल्यों को समाहित कर ‘बौद्ध परंपरा’ के अनुसार अंतिम विदाई संपन्न की।

*बौद्ध वंदना से हुई शुरुआत |

अंतिम यात्रा की शुरुआत घर से ही पूरे विधि-विधान के साथ ‘बौद्ध वंदना’ और धम्म पाठ के साथ हुई। उपस्थित जनसमूह ने स्वर में ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ का उच्चारण किया, जिससे पूरा वातावरण शांति और करुणा से भर गया। यह दृश्य पारंपरिक कर्मकांडों से इतर, एक संयमित और तार्किक अंतिम संस्कार का प्रतीक बना।

*जन-सैलाब ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि*

इस अंतिम यात्रा में गांव और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। हर किसी की आंखें नम थीं और चेहरे पर माताजी के प्रति गहरा सम्मान था। अंतिम यात्रा में बसपा जिला प्रभारी बालकृष्ण महोबिया, दामोदर अहिरवार , वरिष्ठ नेता टी.आर. भण्डारी, बाबूलाल देलवर, एडवोकेट जीवनलाल प्रभाकर, गजेंद्र सिंह कुशवाह, मैनेजर , चंदेरी प्रभारी सुखराम बिजोले, पार्षद रवि मोहने एवं पप्पू सिंह सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिकों, महिलाओं और युवाओं ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी।

*बदलाव की एक मिसाल*। कौशिक परिवार द्वारा लिया गया यह निर्णय चर्चा का विषय बना हुआ है।

उपस्थित प्रबुद्धजनों ने कहा कि समाज को अब मृत्यु के बाद के दिखावे, बोझिल कर्मकांडों और अंधविश्वासों से मुक्त होने की आवश्यकता है। 

सुमंत्रा बाई की अंतिम यात्रा ने न केवल उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया, बल्कि एक प्रगतिशील समाज की नींव रखने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

*नम आंखों से विदाई:*

यात्रा के दौरान लोगों ने नम आंखों से माताजी को नमन किया और उनके द्वारा दिए गए संस्कार एवं मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। पूरा माहौल सादगी, गंभीरता और बौद्ध धम्म के आदर्शों से ओत-प्रोत रहा।

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